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NCERT Solutions for Class 10th Hindi Chapter 9 : आत्मत्राण (Course B)

CBSE NCERT Solutions for Class 10th Hindi Chapter 9 – Atmatran by Rabindranath Thakur – Sparsh II (Hindi Course B). पाठ 3- आत्मत्राण, लेखक -रविंद्रनाथ ठाकुर | स्पर्श भाग-9 हिंदी . Class X Hindi Course B Chapter 9 NCERT Solutions And Paragraph Wise Meanings (भावार्थ) – Atmatran by Rabindranath Thakur – Sparsh II.


भावार्थ :

व्याख्या

विपदाओं से मुझे बचाओ ,यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दुःख ताप से व्यथित चित को न दो सांत्वना नहीं सहीं
पर इतना होवे (करुणामय)
दुःख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले,
तो अपना बल पौरुष न हिले,
हानि उठानी पड़े जगत में लाभ वंचना रही
तो भी मन में न मानूँ क्षय।।

इन पंक्तियों में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ईश्वर से कह रहे हैं कि दुखों से मुझे दूर रखें ऐसी आपसे में प्रार्थना नही कर रहा हूँ बल्कि मैं चाहता हूँ आप मुझे उन दुखों को झेलने की शक्ति दें। उन कष्ट के समय में मैं भयभीत ना हूँ। वे दुःख के समय में ईश्वर से सांत्वना बल्कि उन दुखों पर विजय पाने की आत्मविश्वास और हौंसला चाहते हैं। कोई कहीं कष्ट में सहायता करने वाला भी नही मिले फिर भी उनका पुरुषार्थ ना डगमगाए। अगर मुझे इस संसार में हानि भी उठानी पड़े, कोई लाभ प्राप्त ना हो या धोखा ही खाना पड़े तब भी मेरा मन दुखी ना हो। कभी भी मेरे मन की शक्ति का नाश ना हो।

मेरा त्राण करो अनुहदन तुम यह मेरी प्रार्थना नही
बस इतना होवे (करुणामय)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नही सही।
केवल इतना रखना अनुनय –
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छीन-छीन में।
दुख रात्रि मे करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऎसा हो करुणामय ,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।

कवि कहते हैं कि हे भगवन्! मेरी यह प्रार्थना नहीं है आप प्रतिदिन मुझे भय से छुटकारा दिलाएँ। आप मुझे केवल रोग रहित यानी स्वस्थ रखें ताकि मैं अपने बल और शक्ति के सहारे इस संसार रूपी भवसागर को पार कर सकूँ। मैं यह नहीं चाहता की आप मेरे कष्टों का भार कम करें और ढाँढस बँधायें। आप मुझे निर्भयता सिखायें ताकि मैं सभी मुसीबतों से डटकर सामना कर सकूँ। सुख के दिनों में भी मैं आपको एक क्षण के लिए भी आपको ना भूलूँ। दुःखों से भरी रात में जब सारा संसार मुझे धोखा दे यानी मदद ना करें फिर भी फिर भी मेरे मन में आपके प्रति संदेह ना हो ऐसी शक्ति मुझमें भरें।

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कवि परिचय

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

इनका जन्म 6 मई 1861 को धनि परिवार में हुआ है तथा शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। ये नोबेल पुरस्कार करने वाले प्रथम भारतीय हैं। छोटी उम्र में ही स्वाध्याय से अनेक विषयों का ज्ञान इन्होने अर्जित किया। बैरिरस्ट्री पढ़ने के लिए विदेश भेजे गए लेकिन बिना परीक्षा दिए ही लौट आये। इनकी रचनाओं में लोक-संस्कृति का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित होता है। प्रकृति से इनका गहरा लगाव था।

प्रमुख कार्य

काव्य –  गीतांजलि
कृतियाँ – नैवेद्य, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र और साध्यसंगीत, काबुलीवाला और सैकड़ों अन्य कहानियाँ।
उपन्यास – गोरा, घरे बाइरे, रवींद्र के निबंध।

कठिन शब्दों के अर्थ

• विपदा – कष्ट
• करुणामय – दूसरों पर दया करने वाला
• दुःख-ताप – कष्ट की पीड़ा
• व्यथित – दुखी
• चित्त – हृदय
• सांत्वना – तसल्ली
• पौरुष – पराक्रम
• त्राण – भय से छुटकारा
• अनुदिन – प्रतिदिन
• तरने – पार लगने
• अनामय – स्वस्थ
• अनुनय – प्रार्थना
• वहन – भार उठाना
• नत शिर – सिर झुकाकर
• छीन-छीन – क्षण-क्षण
• दुःख-रात्रि – कष्ट से भरी हुई रात
• वंचना – धोखा
• निखिल – सम्पूर्ण
• महि – धरती
• संशय – शक


प्रश्नोत्तरी :

पृष्ठ संख्या: 49
प्रश्न अभ्यास 
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिये –
1. कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?

उत्तर

कवि करुणामय ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि उसे जीवन की विपदाओं से दूर रखें और शक्ति दे कि इन मुश्किलों पर विजय पा सके। उसका विश्वास अटल रहे।

2. ‘विपदाओं से मुझे बचाओं, यह मेरी प्रार्थना नहीं’ − कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?

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उत्तर

कवि का कहना है कि हे ईश्वर मैं यह नहीं कहता कि मुझ पर कोई विपदा न आए, मेरे जीवन में कोई दुख न आए बल्कि मैं यह चाहता हूँ कि मुझमें इन विपदाओं को सहने की शक्ति दें।

3. कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?

उत्तर

कवि सहायक के न मिलने पर प्रार्थना करता है कि उसका बल पौरुष न हिले, वह सदा बना रहे और कोई भी कष्ट वह धैर्य से सह ले।

4. अंत में कवि क्या अनुनय करता है?

उत्तर

अंत में कवि अनुनय करता है कि चाहे सब लोग उसे धोखा दे, सब दुख उसे घेर ले पर ईश्वर के प्रति उसकी आस्था कम न हो, उसका विश्वास बना रहे। उसका ईश्वर के प्रति विश्वास कभी न डगमगाए।

5. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

आत्मत्राण का अर्थ है आत्मा का त्राण अर्थात आत्मा या मन के भय का निवारण, उससे मुक्ति। कवि चाहता है कि जीवन में आने वाले दुखों को वह निर्भय होकर सहन करे। दुख न मिले ऐसी प्रार्थना वह नहीं करता बल्कि मिले हुए दुखों को सहने, उसे झेलने की शाक्ति के लिए प्रार्थना करता है। इसलिए यह शीर्षक पूर्णतया सार्थक है।

6. अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं? लिखिए।

उत्तर

अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना के अतिरिक्त परिश्रम और संघर्ष, सहनशीलता, कठिनाईयों का सामना करना और सतत प्रयत्न जैसे प्रयास आवश्यक हैं। धैर्यपूर्वक यह प्रयास करके इच्छापूर्ण करने की कोशिश करते हैं।

7. क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?

उत्तर

यह प्रार्थना अन्य प्रार्थना गीतों से भिन्न है क्योंकि अन्य प्रार्थना गीतों में दास्य भाव, आत्म समर्पण, समस्त दुखों को दूर करके सुखशांति की प्रार्थना, कल्याण, मानवता का विकास, ईश्वर सभी कार्य पूरे करें ऐसी प्रार्थनाएँ होती हैं परन्तु इस कविता में कष्टों से छुटकारा नहीं कष्टों को सहने की शक्ति के लिए प्रार्थना की गई है। यहाँ ईश्वर में आस्था बनी रहे, कर्मशील बने रहने की प्रार्थना की गई है।

(ख) निम्नलिखित अंशों का भाव स्पष्ट कीजिए –

1. नत शिर होकर सुख के दिन में

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तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

उत्तर

इन पंक्तियों में कवि कहना चाहता है कि वह सुख के दिनों में भी सिर झुकाकर ईश्वर को याद रखना चाहता है, वह एक पल भी ईश्वर को भुलाना नहीं चाहता।

2. हानि उठानी पड़े जगत्में लाभ अगर वंचना रही

तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

उत्तर

कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि जीवन में उसे लाभ मिले या हानि ही उठानी पड़े तब भी वह अपना मनोबल न खोए। वह उस स्थिति का सामना भी साहसपूर्वक करे।

3. तरने की हो शक्ति अनामय

मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।

उत्तर

कवि कामना करता है कि यदि प्रभु दुख दे तो उसे सहने की शक्ति भी दे। वह यह नहीं चाहता कि ईश्वर उसे इस दुख के भार को कम कर दे या सांत्वना दे। वह अपने जीवन की ज़िम्मेदारियों को कम करने के लिए नहीं कहता बल्कि उससे संघर्ष करने, उसे सहने की शक्ति के लिए प्रार्थना करता है।

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